28.11.09

बदल सा गया है

अब तक हमने यही देखा की जहाँ भी लहू था

घायल को चीरते हर खंजर पे किसी दूजे के हाथ का निशाँ था

और हम सहाफी तो लिखते हैं ऐसी ही रिवायत

लकिन आज मैं कुछ बदलना चाहता हूँ

बस खंजर का मुंह अपनी ओर करना चाहता हूँ!

क्योंकि बदल गयी है अब सहाफत और बदल सी गयी है हमारी फितरत

कलम के सिपाही होने से चापलूसी और झोले भरने में माहिर होने तक

हमारी कलम की सियाही सियाह तो थी लेकिन ताशीर सफ़ेद

हर बूँद में इतना उजाला था के हर दम एक नया सवेरा

आज भी वही कलम है, वही सियाही और वही ताशीर

बदला सिर्फ़ इतना है के कल तक लाते थे सब का सवेरा,

आज अव्वल मेरा सवेरा है

कभी हमारे अल्फाज वो शमशीर थे बिजली बन कर गिरते थे हर बदगुमानी के पहाड़ पर

आज भी अलफ़ाज़ वही, अभी ताकत भी है वही

पर बदल सा गया हैं इस बिजली का गिरना

क्योंकि अब बदलती रहती है तारीफ -ऐ बदगुमानी

मैं सहाफत, आज वो चमकता सितार हूँ

कर जाता हूँ घर एक आरजू हर आंखों में

और कर लेता हूँ ख़ुद की आँखें को बंद

क्यों के अब जीता हूँ "मैं",

बंद कर दिया है
उस ओर जगमगाना जहाँ जीते थे कभी "हम"

कोई जल के खाक हो जाए तो नहीं है कोई ग़म

हम सब हैं सितारे जलते ही रहेंगे

क्यों होने दे अपनी चमक किसी से कम

परवाह नहीं अगर के खो दे ख़ुद की ही पहचान

बस अब तो मेरी दुआ है, के कोई आफताब न आए अब

और निशान भी न रह जाए, के हम भी चमके थे यहाँ कभी

1 comment:

  1. नबील भाई इन दिनों मैं अघोषित रूप से फेसबुक के स्टेट्स पर अध्ययन कर रहा हूं। कई बातें खुलकर सामने आ रही है, मसलन सच बोलना। लोग कभी-कभार वहां सच बोल देते हैं। एक ने कहा था- मैं खुद के अंदर एक एक्टिविस्ट और पत्रकार से जूझ रहा हूं..। कितना बड़ा सच कहा होगा उस इंसान ने ..।
    ये बातें यहां इसलिए कह रहा हूं क्योंकि आपकी कविता में भी मैं ऐसी ही सच्चाई से रूबरू हो रहा रहा हूं। मैं सोचता हूं कि आप किस कदर लिखें होंगे- "लेकिन आज मैं कुछ बदलना चाहता हूँ
    बस खंजर का मुंह अपनी ओर करना चाहता हूँ!"

    ReplyDelete